वो जमीं का टुकड़ा ...
कट गये कितने हजार धमाको से उजड़ा घर संसार बरसो से चला आ रहा है खेल खुनी जाने कितनी हो चुकी है विधवाऎं और गोदे सुनी मगर जस का तस पड़ा है वहीं का वहीं वो जमीं का टुकड़ा ...
« मà¥à¤à¥à¤¯ पà¥à¤·à¥à¤ | मैं साहित्यकार हूँ ॰॰॰ »
कट गये कितने हजार धमाको से उजड़ा घर संसार बरसो से चला आ रहा है खेल खुनी जाने कितनी हो चुकी है विधवाऎं और गोदे सुनी मगर जस का तस पड़ा है वहीं का वहीं वो जमीं का टुकड़ा ...
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